राहुल त्रिपाठी
विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रित उत्सव यानि लोकसभा 20245 चुनावों का बिगुल बज चुका है। नया दौर है नई उम्मीदे हैं यहीं कारण है पक्ष-विपक्ष और वोटर स्वयं को गौरवशाली महसूस कर रहे हैं। सत्ताधारी जहां बीते वर्षां में किए गए कार्यां और आगामी कार्यां को लेकर खुशी से लबरेज होते हुए गौरवांवित महसूस कर रहे हैं, वहीं विपक्षी भी विश्व में भारत के नए कीर्तिमान गढ़ने, साफ नीति-नियत व इसके लिए नई योजनाएं लांच करने वालों को कोसकर नई शक्ति पा रहे हैं, जबकि कई पिछलग्गू नेता अपनी सेटिंग के खेल में बिजी है, उनका आम, खास, जन-जनता से कोई लेना देना नहीं है।
तुलना की बात की जाए तो बीते वर्षों में मुख्य विपक्षी दल जनता के मुद्दे उठाने के लिए सड़क से संसद तक नहीं दिखा, ऐसे में सत्ताधारी दल के कई बड़े-बड़े काम ही जनता को याद है और आने वाले वर्षों में उम्मीदें भी लगाए है। आपसी खींचतान में दल से दलदल बने सत्ताहीन दल जनता के सरोकारों से दूर होकर अपना अस्तिव ही खोज रहे हैं, जबकि सत्ताधारी ने राशन, पेंशन, सम्मान सहित धर्म की कई नीतियों से जन-जन में अपनी गहरी पकड़ बना ली है।
सबसे गौर करने वाला तथ्य यह है कि केंद्र और राज्य में राजनीति करने वाले नेता खुलकर अपना विरोध भी जनता के सामने नहीं कर पा रहे, जबकि जनता की समस्याएं जस की तस बनी हैं, लेकिन बड़े-बड़े कामों में छोटी-छोटी उम्मीदें कोने में दबी पड़ी हैं, दो वर्गां के बीच खाईं में तरह-तरह के घी डालने वाले भी सक्रिय होकर वोट बैंक पक्का कर रहे हैं।
वोटर भी अब संतोषी हो गया है, वह भी इधर-उधर के चक्कर से दूर फ्री मोबाइल डाटा और टीवी आदि में स्वयं को बिजी किए हैं और समय पर और अफसरों के जागने पर जरूरी काम हो जाने की आस में लगाए है।
मैं पूरे चुनाव भर आपसे जुड़कर आपको सक्रिय रखूंगा
नोटः- उक्त ब्लाग के विचार निजी हैं और इसका किसी राजनैतिक दल, व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है, साथ ही इसमें सदैव बदलाव, सुझाव की गुंजाइश है।
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